Wednesday, December 23, 2009

An Ecstasy of Triumph!

Impediments galore
Manoeuvre to
Submerge my confidence
In
Quicksands of failure
They
Arrest my strength, blur my vision
But
Not for long
For
An inner zeal beckons
A pertinacious will opens
Vistas of success
And
Follow accomplishments, applause

A tranquility after
Ineffable upheavals
To see impediments
With their heads bowed

An ecstasy of triumph...

नयी सुबह

फिर सूरज ढला
फिर बिखरने लगी शाम
शायद फिर रह गए
कुछ अधूरे अरमान
फिर गुजरी रात
रौशनी के इंतज़ार में
यह सोच कर
एक नयी सुबह होगी

सूरज की पहली किरण ने
फिर ली अंगड़ाई
देखा
सूखे पौधे में थी
एक नयी कली आई

मुझे विस्मित देख
पौधा मुस्कराया
उसे हँसता देख
कुछ भूला याद आया

फिर ढला सूरज
फिर बिखरी शाम
पर अब नहीं हैं वो
अधूरे अरमान
अब नहीं गुजरी रात
सुबह के इंतज़ार में
मालुम है मुझे
मैं ही वह कली हूँ...

...मैं कौन हूँ?

यह दर्पण क्यों सच कहता है?
डर लगता है आकर इसके सामने
हर बार एक वीभत्स्य रूप
दिखता है धुंधली सी अपनी परछाईं पर

वर्षों पहले वोह रूप था धुंधला
खुद को देख पाते थे
पर
वह तो वर्षों पहले था

बचपन बीता...
अपने रूप को
उस परछाईं से घिरता पाया
धीरे-धीरे

अंतर्वेदना हुई थी वर्षों पहले
एक आह सी उठी थी मन् के भीतर
अपने सच्चे रूप को
खोता देख कर

अब सब कुछ शांत हो चुका है
किसी को आहत कर नहीं रोता है अब
इस परछाईं में विलीन
संवेदनशून्य पाषाण ह्रदय मेरा

आज जब दर्पण में पुनः
इस परछाईं में खोते
अपने अस्तित्व को देखा
तो जाने क्यूँ पूछ बैठे: "तुम कौन हो?"

उत्तर भी एक प्रश्न था
बोला उसने:
"पूछो स्वयं से, "मैं कौन हूँ?""