Wednesday, December 23, 2009

नयी सुबह

फिर सूरज ढला
फिर बिखरने लगी शाम
शायद फिर रह गए
कुछ अधूरे अरमान
फिर गुजरी रात
रौशनी के इंतज़ार में
यह सोच कर
एक नयी सुबह होगी

सूरज की पहली किरण ने
फिर ली अंगड़ाई
देखा
सूखे पौधे में थी
एक नयी कली आई

मुझे विस्मित देख
पौधा मुस्कराया
उसे हँसता देख
कुछ भूला याद आया

फिर ढला सूरज
फिर बिखरी शाम
पर अब नहीं हैं वो
अधूरे अरमान
अब नहीं गुजरी रात
सुबह के इंतज़ार में
मालुम है मुझे
मैं ही वह कली हूँ...

3 comments: