Wednesday, June 9, 2010

फ़िर वही आज

भोर की मद्धिम किरण
छेड़ कर फ़िर तार-सप्तक
देखती है
कि
पहाड़ी पर बसे गाँव से
उठते धुंए के लच्छे
फ़िर
रंग रहे
कोहरे की वह महीन चादर

पक्की सड़क से
अब मिली, अब बिछड़ी
टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों पर
फ़िर
चल रहे
रात के सन्नाटे में
मिटे वह निशान -
चरवाहे निकल पड़े हैं फ़िर
उन्हीं गीतों के साथ

मन्दिर के द्वार पर
लगने लगी है
फ़िर
उन्हीं दुआओं में चुपड़े
चढ़ावों की होड़
भीगने लगी हैं फ़िर
हरसिंगार के फूलों से बिछीं
घाट पर उतरती
नारंगी-सफेद सीढ़ियाँ

जा रहा है 'आज'
फ़िर उस पार
कितनी नावों में कितनी बार