Monday, July 26, 2010

बात ही तो थी, फिर आएगी...

सपनों को डोर दी तो
आसमान में उड़ने लगे
यूं लहराते, यूं गोते खाते
कि बस पूछो मत
फिर क्या
देखते ही देखते
कल, ढंग बदला
आज रंग

बात कुछ ऐसी हुई -
एक आसमानी सपने ने
रंग नया कुछ यूं चुराया
कि देखो तो
आँखें चुन्धियाँ जाएँ
ललचाने वाला -
आजकल के फैशन-परस्त
नाखूनों सा सुर्ख लाल

"नई सेटिंग है...नये किरदार
मैनें सोचा, मैं भी...हें हें हें..."
कह कर
उस लाल सपने ने
अपनी खीसें निपोर दीं
"पर मैं..."
झेंप कर मैं आगे
कुछ कह न सकी

हंसने से बल पड़ी
भौहें सिकोड़ते हुए
सपना बोला:
"मैं कई हूँ, फिर भी वही हूँ
तुम वही हो, दिन-दिन नयी हो
लो, थोड़ा लाल रंग
उधार ले लो
वापस न कर पाओगी
मालूम है, इसलिए
एक शर्त -
जो रंग दूँ, पहन लो"

"भई यह क्या बात हुई?
कुछ और रंगों में रंगी
पुरानी
उन बातों का
क्या करूँ?"
थोड़ा झुन्झला कर मैंने कहा
और
आगे बढ़ने को हुई

सपने ने
ज़ोर का एक
ठहाका लगाया
बोला:
"बात ही तो है, चुक जाएगी"
फिर,
कुछ सोच कर कहने लगा :
"बात ही तो थी, फिर आएगी..."

1 comment:

  1. Ye sapne bada mazaak udaate hain... Such arrogant folks these 'dreams' are...

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