Friday, September 17, 2010

दीप तुम बुझो

जलते रहो,
सब कहते हैं?

मैं कहती हूँ
मेरे दीप
तुम जलो
तुम बुझो

हाँ, डरती हूँ
जब तुम बुझते हो
किन्तु, हर बार
पहले से कम

हाँ, गिरती हूँ
जब तुम बुझते हो
फिर, उठती हूँ
और ऊपर

लगता है
जब तुम बुझते हो
जो माना था
अब जान लिया

जगता है
जब तुम बुझते हो
खोने-पाने का
अविरल अहसास

दीप, क्या दीप
अदीप के बिना?

मैं -
जो तुमसे हूँ
उठूँ
जगूँ
इसलिए, मेरे दीप
तुम बुझो

मेरे दीप
फिर जलो...

2 comments:

  1. हम चाहते हैं की ये दीप हमेशा जलते रहे और यही चाह हमें गुमराह करती है ....काफी बढ़िया लिखा है आपने ..

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