Thursday, September 30, 2010

बचपन

क्यों गर्मी की छुट्टी
को अब न होती बेचैन
मासूम शैतानियाँ और
खिलौने वाली ट्रेन ?

न होती बारिश के खड्डों में
छोटे पैरों की छप-छप
न स्कूल बस की सीट
सुनती घंटों वो गप-शप

न गली का चूरन
न पोपिन्स की गोली
अब न मैगी की ज़िद
और न शक्कर की चोरी

न पकड़म- पकड़ाई
करती घंटों का खेल
न छिपन-छिपाई का
अब होता है मेल

न दिखते पहाड़े में
परियों के पर
न कागज की नाव
न मोगली का घर

न झूठ-मूठ के गुस्से पे
अब माँ का मनाना
न मीठी सी धुन में
वो लोरी सुनाना

पोटली बाबा के किस्सों
को लेकर अपने संग
बादल के उस पार
क्यों लौट गया बचपन?

7 comments:

  1. 1. baar baar aati hai mujhko madhur yaad bachpan teri...
    gaya, le gaya tu jeevan ki sabse mast khushi meri...

    2. ye daulat bhi le le, ye shohrat bhi le lo, bhale chheen lo mujhse meri jawani...
    magar mujhko lauta do bachpan ka saawan, wo kaaghaz ki kashti, wo baarish ka paani...

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  2. Naa rha mamaa ke haton ka pyar,
    naa hi doston ke sang mithi takrar,

    aj hai to bas hasi ka mukahuta,
    jhuthi khushi ke beech ` all iz well` ka dhokha,

    kash ho sakti fir se wo gantiyon ki tan tan,
    kash koi lauta sakta mera wo bachpan....

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  3. पेंसिल के छिलकें ..

    बचपन की पेंसिल के छिलकें ..
    शायद सबसे कीमती चीज़ थे....
    ..मन करता है कि वो पुराना ज्योमिट्री बाक्स दुबारा से मिल जाये,
    जिसमें मैने उन छिलको के साथ बचपन छुपा के रखा है ..

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  4. @With Malice: Long time! Thanks for visiting again! :-)

    @Akshu and Aakash: Nice! :-)

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  5. Childhood is short, maturity is forever

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  6. Well I must agree you have the specialty of spell binding people during those long verses. It was like a flow. :)

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  7. Another one spell bounded with all your poems :-)
    A wonderful poetess you are!!

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