Wednesday, March 9, 2011

अपने शहर को बदलते देखा है

मैंने अपने शहर को बदलते देखा है

तिराहे की चाय वाली टपरी को
अब कैफे कॉफ़ी डे से डरते देखा है

कराई-लईया की कच्ची दुकानों को
कैंडी शॉप के मर्तबानों में टूटते देखा है

मनिहारिन की चूड़ियों के रंगों को
फैन्सी बैंगल्स में बिखरते देखा है

आम की बगिया के पेड़ों को
कांच की ऊंचाइयों से कटते देखा है

चौक के चौराहे को
पुरानी गलियों से बिछड़ते देखा है

मकबरे की ढहती दीवारों पर
नए नामों को उभरते देखा है

इस शहर की अदाओं को
उन् शहरों की नुमाइश में पिछड़ते देखा है

एक शहर था
मैंने उस शहर में ख़ुद को, और
ख़ुद में उस शहर को गुज़रते देखा है
अपने शहर को बदलते देखा है...

Tuesday, March 1, 2011

Love Poem I - Anticipation: Of A Girl Getting Engaged

This afternoon brought

A gush of fragrant wind

I sat by the window

Thinking of your ring

I heard it promised

To hold fast, bring hither

The day of the Vermilion

The 'Sutra' and the 'Chaadar'


My love, isn't it

A beautiful thing?

My world fits so well

The circle of your ring!


:-)