Monday, November 12, 2012

November Prose

A demure sun caresses the sky this morning
There is November in my room
How they dance -
Her dainty, pastel feet
To a faint autumnal song
The last of the Harshringaars
Have fallen on the window sill -
Fragrant and orange-white in the wintry mist
The potted lilacs have begun to get busy
The world within their reach
Waiting to wear purple
My fingers pleasant and playful in the steam
From today's morning tea with extra ginger

Soon it is going to be December -
A month that has become warm
With a love now legalised
When the stars have hung so low
That our shadows have caught them alive -
Their light calling us home
Their heat conceiving soon-to-be-born dreams

But it is only November now
So, I'll think only of November
Of the Lilacs, which like me, will soon be ready
Of the feet which will walk up to December
Of the fingers which will wade through the foggy pages
And look for a November prose.

Sunday, August 19, 2012

जब हर तरफ इंसान है...

एक तरफ ईंटों का मजहब, एक तरफ ईमान है
क्यों एक तरफ ये गुट खड़े, जब हर तरफ इंसान है

वो ईंट से  फिर लाल रंग की दो दीवारें खींचेंगे
उस तरफ़ तेरे घर जलेंगे, इस तरफ़ मेरे टूटेंगे

इस काफ़िराना बात पर वो उसकी दुहाई लायेंगे
मैं तुझको फिर दफनाऊंगा, तुझसे मुझे जलवायेंगे

तेरा खून भी इस मिट्टी पे, मेरी राख भी इस मिट्टी पे
एक मिट्टी ही दोनों तरफ, फिर ख़ाक क्यों इस मिट्टी पे

ऊंची दीवारें हैं खिंची, रौंदा पड़ा ईमान है
क्यों एक तरफ ये गुट खड़े, जब हर तरफ इंसान है



Saturday, August 18, 2012

From An Instigator To A Rioting Mob

"If India lives, who dies; if India dies, who lives?" ~ Mahatma Gandhi

In the wake of the
Assam violence, Mahatma's words are both, a challange and an inspiration.

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Congratulations!

You've done it yet again
May I say, it is always a pleasure
To see you soaking in each other's blood
While things fall apart at leisure

I admit, at times I am jittery
When your secular sentiments unite
But my period of lull is brief
For you are fools, who never disappoint

Of course, that is what I want!
And you make the deal damn easy
Just goad your prickly identities
Divide and laugh - the strategy

Each time when the deed is done
You ponder who I am
Who started the fire and how
Is it the next-door Raheem or Ram?

You deserve a sincere thank you
To let me get away each time
So, with the bicker and brawl at Raisina
Here's for you, my gift sublime

When this madness is over
You shall all have something to keep
A billion shadows of guilt
And countless tears to weep

Tuesday, July 24, 2012

उधेड़बुन

पुराने दौर की यादों से मुलाक़ात
आज-कल फेसबुक की बदौलत
हो ही जाती है
आस-पास ही रहती हैं
अक्सर ही मिल जाती हैं

कुछ से अनजान होने का नाटक
मन को तसल्ली देता है
पर कुछ बड़ी बे-तकल्लुफ़ होती हैं
आज ऐसी ही एक याद अटक गयी

यूँ तो सच है कि वक्त बीत गया है
पर अचानक एहसास होता है
(यह वही वाला एहसास है जिससे छिपने की हम हज़ार कोशिश करते हैं)
कि वक्त कितना बीत गया है
इतना, कि उस ज़माने के सच को
इस ज़माने के किस्सों में
बदलने कि धमकी देता है
"क्या हम कभी वैसे थे
और वैसा होने का सोचते थे?
आज कैसे हैं?"

'वैसे', 'वैसा' और 'आज कैसे'
की यह उधेड़बुन फिर कहीं
'क्या खोया, क्या पाया'
के तराज़ू में न बदल जाए?
अब इस नाप-तौल से डर लगता है
क्योंकि वक्त वाकई बीत गया है


Friday, June 15, 2012

ख़राशें

चाँद और तारे कितने बेबस लगते -
बादल आते और चले जाते
जब जी चाहता वे उन्हें प्यार से ढकते
जब मन आता, बेपरवाह नंगा कर देते

कितनी ही रातें उसने यह देखा
और हर रात कितनी ही बार
उसने बारिश को पुकारा

शायद ख़राशों में
आवाज़ दब जाती थी

न तो ख्व़ाब आये, न ही नींद


Tuesday, May 22, 2012

दूर कहीं इसी रास्ते पर


पता है
पहले धरती और अंबर
एक ही थे |

फिर कुछ हुआ
- 'मैं' का एहसास|
और अक्सर
ऐसा होने पर जो होता है
वो हुआ -
अहम् फूटा, विश्वास टूटा, साथ छूटा|

जब तक भ्रम टूटता
सब बिखर चुका था|

विरह की पीड़ा जब बढ़ जाती
तो अंबर पहले गरजता  फिर खूब रोता
धरती भी अंबर के इस एहसास को समेटने के लिए
ख़ुद को तपाती और सूख जाती

समय बीतता गया

अंबर, कभी बिजली की चमक में
धरती को निहारता
कभी बादल लटका कर
उसके हाथों को चूमने की कोशिश करता
धरती कभी उचक कर
उन बादलों की ऊँगली पकड़ती
कभी समंदर की हिलोरों से
अंबर को भिगोने की कोशिश करती

अहम् में 'हम' को पहचानने  के लिए
शायद विरह की व्याकुलता ज़रूरी होती है

आखिर दोनों ने,
जो लंबा रास्ता दिख रहा था,
उसे बीच में रख कर
साथ चलने की सोची
अंबर ने धरती से कहा -
"इस बार आगे चल कर
तुम्हें दूर नहीं करूँगा
कभी तो तुम्हें पा ही लूँगा"
धरती अंबर से बोली -
"इस बार अविश्वास कर
तुम्हें दूर नहीं करुँगी
कभी तो तुम्हें छू ही लूँगी"

दूर कहीं इसी रास्ते पर
एक दिन क्षितिज का जन्म हुआ...

Saturday, April 7, 2012

कु-सीता

नही मुझे मंज़ूर तुम्हारी
चुप्पी और बलिदान
न मुझमें है सहनशीलता
न मानस का ज्ञान
सीता तुम क्यों हो सीता
जब राम नही बन पाए राम

नहीं चाहिए धैर्य तुम्हारा
न बनना मुझे महान
न होना है अब विलीन
कर धरती का आह्वान
सीता तुम क्यों हो सीता
जब राम नही बन पाए राम

क्यों बनूँ मैं तुम सी बोलो
झूठा है ये सम्मान
जो लोग तुम्हें मुझमें ढूंढें
क्यों करें सिया अपमान
सीता तुम क्यों हो सीता
जब राम नही बन पाए राम

ये कैसा मानस चरित्र
कैसी मर्यादित शान
जिसके पौरुष-वश तुम बनती
एक सामजिक अनुदान
सीता तुम क्यों हो सीता
जब राम नही बन पाए राम

अब भी घुटती उन पन्नों में
बन संस्कृति का अभिमान
तुम और तुम-जैसी कितनी
क्या मुझसे हैं अनजान
सीता तुम क्यों हो सीता
जब राम नहीं बन पाए राम

हूँ नही किसी की ख्वाइश
मैं नहीं कोई और नाम
मैं नही बनूँगी सीता
जब राम नही हैं राम

Sunday, March 11, 2012

Had I loved You Just A Little Less


Inspired by Ruttie Jinnah's last letter to Muhammad Ali Jinnah:



Had I loved you just a little less

I would have remained with you


With the night gone, there was so much

That was taken away -

The quiver of the dark through the brief candle

The reticent silence between the moist words

The familiar scatter of the dust under the shoes...


The musk had grown faint

I had stared for far too long

There were no more shadows to chase


When the twilight drew a strange silhouette

And not much was left


I saw my fugitive dreams become you

Tuesday, February 21, 2012

आज धूप फ़िर निकली तो

इस कविता ने खुद को लिखा है| सुबह उठते ही पहली चार पंक्तियाँ ज़हन में खुद - ब - खुद आयीं | सोचा गूगल पर जाकर झेलम के बारे में थोड़ा और पढूं| पता चला कि कश्मीर में वेरीनाग से निकल कर ये नदी पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की झेलम तहसील में पहुँचती है, जो इसके दायें किनारे पर स्थित है| विकीपीडिया में बहुत सारी जानकारी पर सरसरी निगाह डालते हुए अचानक नज़र 'टिल्ला जोगियाँ' पर ठहरी| झेलम शहर के पास से गुज़रते पूर्वी नमक के पहाड़ों की सबसे ऊंची ये पहाड़ी, हज़ारों वर्षों तक सूर्य देवता की अर्चना का स्थान रही है| गुरु गोरखनाथ के कनफटा जोगियों का एक स्तूप भी यहाँ है| वारिस शाह कहते हैं कि रांझा, हीर के प्यार में हताश होकर इन जोगियों में शामिल हो आध्यात्म की शरण लेने यहाँ आया था| क्या ये इत्तेफाक है कि १९९८ में, पृथ्वी मिसाइल के १९८८ के सफल परीक्षण के ठीक दस साल बाद, पाकिस्तान ने भी ज़मीन - से - ज़मीन पर मार करने वाली घौरी मिसाइल का सफल परीक्षण टिल्ला जोगियाँ से किया? उसके बाद तो ऐसे जवाबों का सिलसिला चल उठा| कभी इस पार से, कभी उस पार से| मोहम्मद घौरी और पृथ्वी राज चौहान की रंजिश को दोनों मुल्कों की सियासी ताकतों ने किस कदर ज़िंदा रखा| ये कविता सोच रही है कि धूप तो हर जगह एक है...फ़िर क्यों?


आज धूप फ़िर निकली तो
इन चिनारों से छन कर
झेलम में बहती हुई
तुम तक भी पहुँचेगी

एक संदेसा साथ भेजा है
टिल्ला जोगियाँ पर मिलना उससे
ज्यादा देर तक ठहरती है वहाँ
कहती है घौरी और पृथ्वी की रंजिश से मुझे क्या
इश्क के जोगी एक कौम, एक ज़बान, एक मुल्क
है न?

तो राँझा, तुम वहाँ से निकल कर मेरे गाँव आओ
अब्बा कहते हैं धूप का कोई रंग नहीं होता
आज धूप फ़िर निकली तो पता नहीं चलेगा
कौन सी तुम्हारी है, कौन मेरी...

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'Aaj Dhoop Phir Nikli To'

It is uncanny how this poem comes about and it reinforces my belief that poems already exist somewhere; they just need a medium. I wake up this morning with the first four lines of the poem miraculously in my sub-conscious. My fingers start itching to write. I decide to look up Google for more information on Jhelum river. Jhelum originates at Verinag in Kashmir and on its course enters the Jhelum district situated on its right bank, in Pakistan's Punjab. While going through the factual details in Wikipedia my glance falls upon the hyperlink, 'Tilla Jogian'. I click and come to know that it is the highest peak of the Eastern Salt Range, situated a little outside the west of the Jhelum district. It has been a place of worship of the Sun god for thousands of years. This is where the 'kanphataa jogis', the followers of Guru Gorakhnath, have left behind a monastery. Raanjha, the protagonist from Waris Shah's epic love poem is also said to have come here to sublimate his love and passion for Heer, in the spiritual world. Is it mere coincidence that in 1998, ten years after the successful test of India's Prithvi missile, Pakistan tests its surface-to-surface Ghouri missile from Tilla Jogian? And that is how the 'answering back' starts, from both the sides. The symbolism of a historical battle has been kept alive in a political war. It is the same sun on both the sides...then why? This poem wonders...

Aaj dhoop phir nikli to
Inn chinaaron se chhan kar
Jhelum mein behti hui
Tum tak bhi pahunchegi

Ek sandesa bheja hai
Tilla Jogian par milna uss-se
Zyaada der tak teherti hai wahan
Kehti hai Ghouri aur Prithvi ki ranjish se mujhe kya?
Ishq ke jogi ek kaum, ek zabaan, ek mulk
Hai na?

To Raanjha, tum wahan se nikal mere gaanv aao
Abba kehte hain dhoop ka koi rang nahi hota
Aaj dhoop phir nikli to pata nahi chalega
Kaun si tumhari hai, kaun meri...

Saturday, February 11, 2012

Your Days Away From Mine

Take if you must
Your days away from mine

Our love has outgrown the letters
There's dust on the road
And the coffee's gone cold
But, ain't we better together
And, there's no other way?

So, let's play a game - you and I
Of strangers who once meet
You, the time traveler, and I, your wife
I colour my hair grey
And tell you stories from the future we share
Aren't they lovely -
Flashbacks to take, memories to make

Having nowhere to go
I keep something for the next time

Till the, only till then
I let you take
Your days away from mine

Friday, January 27, 2012

The Spring Promise

O cold and callous winter

So wanton in thy pride

Don't you see the nascent buds

And the slowly turning tide?



White words, awake from slumber

Now flower and spread their seed

The icy walls are melting

The West wind is taking speed



O cold and callous winter

Take heed and melt thy pride

Frozen rivers begin to speak

New Spring has taken a stride

Sunday, January 22, 2012

मेरे शब्द

किसको दूँ मैं
इनकी तीव्रता
इनकी अकुलाहट
इनका अभिमान

मेरे अनगिनत जन्मों के प्रतीक
कितनी ही यात्राओं के अवशेष
कभी उन्मादित - उन्मुक्त
कभी संचित - संकुचाये

ये शब्द
- जिनके भीतर, मैं मूक -
किसको दूँ मैं?


'Mere Shabd'

Kisko doon main
Inki teevrata
Inki akulaahat
Inka abhimaan

Mere anginat janmon ke prateek
Kitni hi yaatraaon ke avshesh
Kabhi unnmaadit - unnmukt
Kabhi sanchit - sankuchaaye

Ye shabd
- jinke bheetar, main mook -
Kisko doon main?

Thursday, January 5, 2012

Voices of the Ancient

The ancient island drowns
But Sappho lives
In the fragments
Which have traveled across time
To Philomela - silent but seething
Her scars woven into a crimson voice
Passed from a generation to another
Despite failed attempts
Of Tereus and his tribe

The idelible mark tells Celie
Being a woman is beautiful
Not from the ribs
Of the He-God's favourite
But alive in those scars
We become the women we are

Yes
Medusa is lovely
It is wonderful to hear her laugh