Tuesday, February 21, 2012

आज धूप फ़िर निकली तो

इस कविता ने खुद को लिखा है| सुबह उठते ही पहली चार पंक्तियाँ ज़हन में खुद - ब - खुद आयीं | सोचा गूगल पर जाकर झेलम के बारे में थोड़ा और पढूं| पता चला कि कश्मीर में वेरीनाग से निकल कर ये नदी पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की झेलम तहसील में पहुँचती है, जो इसके दायें किनारे पर स्थित है| विकीपीडिया में बहुत सारी जानकारी पर सरसरी निगाह डालते हुए अचानक नज़र 'टिल्ला जोगियाँ' पर ठहरी| झेलम शहर के पास से गुज़रते पूर्वी नमक के पहाड़ों की सबसे ऊंची ये पहाड़ी, हज़ारों वर्षों तक सूर्य देवता की अर्चना का स्थान रही है| गुरु गोरखनाथ के कनफटा जोगियों का एक स्तूप भी यहाँ है| वारिस शाह कहते हैं कि रांझा, हीर के प्यार में हताश होकर इन जोगियों में शामिल हो आध्यात्म की शरण लेने यहाँ आया था| क्या ये इत्तेफाक है कि १९९८ में, पृथ्वी मिसाइल के १९८८ के सफल परीक्षण के ठीक दस साल बाद, पाकिस्तान ने भी ज़मीन - से - ज़मीन पर मार करने वाली घौरी मिसाइल का सफल परीक्षण टिल्ला जोगियाँ से किया? उसके बाद तो ऐसे जवाबों का सिलसिला चल उठा| कभी इस पार से, कभी उस पार से| मोहम्मद घौरी और पृथ्वी राज चौहान की रंजिश को दोनों मुल्कों की सियासी ताकतों ने किस कदर ज़िंदा रखा| ये कविता सोच रही है कि धूप तो हर जगह एक है...फ़िर क्यों?


आज धूप फ़िर निकली तो
इन चिनारों से छन कर
झेलम में बहती हुई
तुम तक भी पहुँचेगी

एक संदेसा साथ भेजा है
टिल्ला जोगियाँ पर मिलना उससे
ज्यादा देर तक ठहरती है वहाँ
कहती है घौरी और पृथ्वी की रंजिश से मुझे क्या
इश्क के जोगी एक कौम, एक ज़बान, एक मुल्क
है न?

तो राँझा, तुम वहाँ से निकल कर मेरे गाँव आओ
अब्बा कहते हैं धूप का कोई रंग नहीं होता
आज धूप फ़िर निकली तो पता नहीं चलेगा
कौन सी तुम्हारी है, कौन मेरी...

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'Aaj Dhoop Phir Nikli To'

It is uncanny how this poem comes about and it reinforces my belief that poems already exist somewhere; they just need a medium. I wake up this morning with the first four lines of the poem miraculously in my sub-conscious. My fingers start itching to write. I decide to look up Google for more information on Jhelum river. Jhelum originates at Verinag in Kashmir and on its course enters the Jhelum district situated on its right bank, in Pakistan's Punjab. While going through the factual details in Wikipedia my glance falls upon the hyperlink, 'Tilla Jogian'. I click and come to know that it is the highest peak of the Eastern Salt Range, situated a little outside the west of the Jhelum district. It has been a place of worship of the Sun god for thousands of years. This is where the 'kanphataa jogis', the followers of Guru Gorakhnath, have left behind a monastery. Raanjha, the protagonist from Waris Shah's epic love poem is also said to have come here to sublimate his love and passion for Heer, in the spiritual world. Is it mere coincidence that in 1998, ten years after the successful test of India's Prithvi missile, Pakistan tests its surface-to-surface Ghouri missile from Tilla Jogian? And that is how the 'answering back' starts, from both the sides. The symbolism of a historical battle has been kept alive in a political war. It is the same sun on both the sides...then why? This poem wonders...

Aaj dhoop phir nikli to
Inn chinaaron se chhan kar
Jhelum mein behti hui
Tum tak bhi pahunchegi

Ek sandesa bheja hai
Tilla Jogian par milna uss-se
Zyaada der tak teherti hai wahan
Kehti hai Ghouri aur Prithvi ki ranjish se mujhe kya?
Ishq ke jogi ek kaum, ek zabaan, ek mulk
Hai na?

To Raanjha, tum wahan se nikal mere gaanv aao
Abba kehte hain dhoop ka koi rang nahi hota
Aaj dhoop phir nikli to pata nahi chalega
Kaun si tumhari hai, kaun meri...

2 comments:

  1. really like the evolution process of this poem..

    btw, the last two lines reminded me of the following sequence from krantiveer :D :D ..
    http://www.youtube.com/watch?v=6bOe9RBHROI

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