Saturday, April 7, 2012

कु-सीता

नही मुझे मंज़ूर तुम्हारी
चुप्पी और बलिदान
न मुझमें है सहनशीलता
न मानस का ज्ञान
सीता तुम क्यों हो सीता
जब राम नही बन पाए राम

नहीं चाहिए धैर्य तुम्हारा
न बनना मुझे महान
न होना है अब विलीन
कर धरती का आह्वान
सीता तुम क्यों हो सीता
जब राम नही बन पाए राम

क्यों बनूँ मैं तुम सी बोलो
झूठा है ये सम्मान
जो लोग तुम्हें मुझमें ढूंढें
क्यों करें सिया अपमान
सीता तुम क्यों हो सीता
जब राम नही बन पाए राम

ये कैसा मानस चरित्र
कैसी मर्यादित शान
जिसके पौरुष-वश तुम बनती
एक सामजिक अनुदान
सीता तुम क्यों हो सीता
जब राम नही बन पाए राम

अब भी घुटती उन पन्नों में
बन संस्कृति का अभिमान
तुम और तुम-जैसी कितनी
क्या मुझसे हैं अनजान
सीता तुम क्यों हो सीता
जब राम नहीं बन पाए राम

हूँ नही किसी की ख्वाइश
मैं नहीं कोई और नाम
मैं नही बनूँगी सीता
जब राम नही हैं राम