Tuesday, May 22, 2012

दूर कहीं इसी रास्ते पर


पता है
पहले धरती और अंबर
एक ही थे |

फिर कुछ हुआ
- 'मैं' का एहसास|
और अक्सर
ऐसा होने पर जो होता है
वो हुआ -
अहम् फूटा, विश्वास टूटा, साथ छूटा|

जब तक भ्रम टूटता
सब बिखर चुका था|

विरह की पीड़ा जब बढ़ जाती
तो अंबर पहले गरजता  फिर खूब रोता
धरती भी अंबर के इस एहसास को समेटने के लिए
ख़ुद को तपाती और सूख जाती

समय बीतता गया

अंबर, कभी बिजली की चमक में
धरती को निहारता
कभी बादल लटका कर
उसके हाथों को चूमने की कोशिश करता
धरती कभी उचक कर
उन बादलों की ऊँगली पकड़ती
कभी समंदर की हिलोरों से
अंबर को भिगोने की कोशिश करती

अहम् में 'हम' को पहचानने  के लिए
शायद विरह की व्याकुलता ज़रूरी होती है

आखिर दोनों ने,
जो लंबा रास्ता दिख रहा था,
उसे बीच में रख कर
साथ चलने की सोची
अंबर ने धरती से कहा -
"इस बार आगे चल कर
तुम्हें दूर नहीं करूँगा
कभी तो तुम्हें पा ही लूँगा"
धरती अंबर से बोली -
"इस बार अविश्वास कर
तुम्हें दूर नहीं करुँगी
कभी तो तुम्हें छू ही लूँगी"

दूर कहीं इसी रास्ते पर
एक दिन क्षितिज का जन्म हुआ...