Friday, June 15, 2012

ख़राशें

चाँद और तारे कितने बेबस लगते -
बादल आते और चले जाते
जब जी चाहता वे उन्हें प्यार से ढकते
जब मन आता, बेपरवाह नंगा कर देते

कितनी ही रातें उसने यह देखा
और हर रात कितनी ही बार
उसने बारिश को पुकारा

शायद ख़राशों में
आवाज़ दब जाती थी

न तो ख्व़ाब आये, न ही नींद