Tuesday, July 24, 2012

उधेड़बुन

पुराने दौर की यादों से मुलाक़ात
आज-कल फेसबुक की बदौलत
हो ही जाती है
आस-पास ही रहती हैं
अक्सर ही मिल जाती हैं

कुछ से अनजान होने का नाटक
मन को तसल्ली देता है
पर कुछ बड़ी बे-तकल्लुफ़ होती हैं
आज ऐसी ही एक याद अटक गयी

यूँ तो सच है कि वक्त बीत गया है
पर अचानक एहसास होता है
(यह वही वाला एहसास है जिससे छिपने की हम हज़ार कोशिश करते हैं)
कि वक्त कितना बीत गया है
इतना, कि उस ज़माने के सच को
इस ज़माने के किस्सों में
बदलने कि धमकी देता है
"क्या हम कभी वैसे थे
और वैसा होने का सोचते थे?
आज कैसे हैं?"

'वैसे', 'वैसा' और 'आज कैसे'
की यह उधेड़बुन फिर कहीं
'क्या खोया, क्या पाया'
के तराज़ू में न बदल जाए?
अब इस नाप-तौल से डर लगता है
क्योंकि वक्त वाकई बीत गया है